Story of a Butcher | सदन कसाई और भगवान की कथा, story of sadan butcher and god

भक्त और भगवान की कथा

ओम नमो भगवते वासुदेवाय

सदन कसाई और भगवान की कथा

भक्त और भगवान की कथा

सदन कसाई और भगवान की कथा

story of sadan butcher :–

एक कसाई था सदन। वह बहुत ईमानदार था, वो भगवान के नाम कीर्तन में मस्त रहता था। यहां तक की मांस को काटते-बेचते हुए भी वह भगवान नाम गुनगुनाता रहता था।
एक दिन वह अपनी ही धुन में कहीं जा रहा था, कि उसके पैर से कोई पत्थर टकराया। वह रूक गया, उसने देखा एक काले रंग के गोल पत्थर से उसका पैर टकरा गया है। उसने वह पत्थर उठा लिया व जेब में रख लिया, यह सोच कर कि यह माँस तोलने के काम आयेगा।


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वापिस आकर उसने वह पत्थर माँस के वजन को तोलने के काम में लगाया। कुछ ही दिनों में उसने समझ लिया कि यह पत्थर कोई साधारण नहीं है। जितना वजन उसको तोलना होता, पत्थर उतने वजन का ही हो जाता है।
धीरे-धीरे यह बात फैलने लगी कि सदन कसाई के पास वजन करने वाला पत्थर है, वह जितना चाहता है, पत्थर उतना ही तोल देता है। किसी को एक किलो मांस देना होता तो तराजू में उस पत्थर को एक तरफ डालने पर, दूसरी ओर एक किलो का मांस ही तुलता। अगर किसी को दो किलो चाहिए हो तो वह पत्थर दो किलो के भार जितना भारी हो जाता।




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इस चमत्कार के कारण उसके यहां लोगों की भीड़ जुटने लगी। भीड़ जुटने के साथ ही सदन की दुकान की बिक्री बढ़ गई।
बात एक शुद्ध ब्राह्मण तक भी पहुंची। हालांकि वह ऐसी अशुद्ध जगह पर नहीं जाना चाहता थे, जहां मांस कटता हो व बिकता हो। किन्तु चमत्कारिक पत्थर को देखने की उत्सुकता उसे सदना की दुकान तक खींच लाई ।
दूर से खड़ा वह सदन कसाई को मीट तोलते देखने लगा। उसने देखा कि कैसे वह पत्थर हर प्रकार के वजन को बराबर तोल रहा था। ध्यान से देखने पर उसके शरीर के रोंए खड़े हो गए। भीड़ के छटने के बाद ब्राह्मण  सदन कसाई के पास गया।
ब्राह्मण को अपनी दुकान में आया देखकर सदन कसाई प्रसन्न भी हुआ और आश्चर्यचकित भी। बड़ी नम्रता से सदन ने ब्राह्मण को बैठने के लिए स्थान दिया और पूछा कि वह उनकी क्या सेवा कर सकता है!



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ब्राह्मण बोला: तुम्हारे इस चमत्कारिक पत्थर को देखने के लिए ही मैं तुम्हारी दुकान पर आया हूँ, या युँ कहें कि ये चमत्कारी पत्थर ही मुझे खींच कर तुम्हारी दुकान पर ले आया है।
बातों ही बातों में उन्होंने सदन कसाई को बताया कि जिसे पत्थर समझ कर वो माँस तोल रहा है, वास्तव में वो शालीग्राम जी हैं, जोकि भगवान का स्वरूप होता है। शालीग्राम जी को इस तरह गले-कटे मांस के बीच में रखना व उनसे मांस तोलना बहुत बड़ा पाप है।
सदन बड़ी ही सरल प्रकृति का भक्त था। ब्राह्मण की बात सुनकर उसे लगा कि अनजाने में मैं तो बहुत पाप कर रहा हूं। अनुनय-विनय करके सदना ने वह शालिग्राम उन ब्राह्मण को दे दिया और कहा कि “आप तो ब्राह्मण हैं, अत: आप ही इनकी सेवा-परिचर्या करके इन्हें प्रसन्न करें।मेरे योग्य कुछ सेवा हो तो मुझे अवश्य बताएं।“
ब्राह्मण उस शालीग्राम शिला को बहुत सम्मान से घर ले आए। घर आकर उन्होंने श्रीशालीग्राम को स्नान करवाया, पँचामृत से अभिषेक किया व पूजा-अर्चना आरम्भ कर दी।



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कुछ दिन ही बीते थे कि उन ब्राह्मण के स्वप्न में श्री शालीग्राम जी आए व कहा: हे ब्राह्मण! मैं तुम्हारी सेवाओं से प्रसन्न हूं, किन्तु तुम मुझे उसी कसाई के पास छोड़ आओ।
स्वप्न में ही ब्राह्मण ने कारण पूछा तो उत्तर मिला कि- तुम मेरी अर्चना-पूजा करते हो, मुझे अच्छा लगता है, परन्तु जो भक्त मेरे नाम का गुणगान कीर्तन करते रहते हैं, उनको मैं अपने-आप को भी बेच देता हूँ। सदन तुम्हारी तरह मेरा अर्चन नहीं करता है परन्तु वह हर समय मेरा नाम गुनगुनाता रहता है जोकि मुझे अच्छा लगता है, इसलिए तो मैं उसके पास गया था। 
ब्राह्मण अगले दिन ही, सदन कसाई के पास गया व उनको प्रणाम करके, सारी बात बताई व श्रीशालीग्रामजी को उन्हें सौंप दिया ब्राह्मण की बात सुनकर सदन कसाई की आंखों में आँसू आ गए। मन ही मन उन्होंने माँस बेचने-खरीदने के कार्य को तिलांजली देने की सोची और निश्चय किया कि यदि मेरे ठाकुर को कीर्तन पसन्द है, तो मैं अधिक से अधिक समय नाम-कीर्तन ही करूंगा।




English translation


Story of the devotee and God

Story of sadan Butcher and God



story of sadan butcher:–


There was a butcher’s sadan. He was very honest, he used to live in Kirtan in the name of God. Even while cutting meat, he used to hum the name of God.

One day he was going somewhere in his tune, that a stone hit his leg. She stopped, saw a black round stone hit her leg. He took the stone and placed it in his pocket, thinking that it would be useful for breaking the meat.



After coming back, he used that stone to weigh the weight of the meat. In a few days he realized that this stone is not ordinary. The more weight that has to be weighed, the more weight the stone becomes.

Gradually, it started to spread that Sadan Butcher has a weighing stone, she breaks it as much as she wants. If someone has to give one kilo of meat, then putting that stone in the scales on one side, on the other hand, weighs only one kilo of meat. If one must have two kilos then that stone becomes heavy as a weight of two kilos.




Due to this miracle, a crowd of his people gathered. As the crowd gathered, sales of Sadan shop increased.

The talk also reached a pure Brahmin. However, he did not want to go to such an unclean place, where meat is cut and sold. But the eagerness to see the miracle stone pulled him to Sadan’s shop.

Standing from a distance, he began to see Sadan butcher weighing meats. He saw how that stone was weighing every type of weight. After watching carefully, the body’s hairs stood up. The Brahmin went to Sadan Butcher after the crowd had recovered

Sadan Butcher was pleased and surprised to see the Brahmin in his shop. Very humbly Sadan gave the Brahmin a place to sit and asked what he could do to serve them!




The Brahmin said: I have come to your shop only to see this miracle stone, or rather say that this miracle stone has pulled me to your shop.

In many cases, he told Sadan Butcher that by understanding which stone she is weighing, in reality she is Shaligram ji, which is the form of God. It is a great sin to keep Shaligram ji in the middle of the meat that has been slaughtered and to wean them.

Sadan was a devotee of a very simple nature. Hearing the talk of a Brahmin, he realized that I am inadvertently committing a lot of sin. By persuasion, he gave Shaligram to the Brahmin and said, “You are a Brahmin, so please make them happy by caring for them. There should be some service worthy of me. Let me know.”

The Brahmin brought that Shaligram Shila home with great respect. On coming home, he bathed Sri Aligram, anointed Panchamrit and started worshiping.


A few days had passed that in the dream of those Brahmins, Shri Shaligram Ji came and said: O Brahmin! I am happy with your services, but you leave me with the same butcher.

When the Brahmin asked the reason in his dream, he got an answer that – you worship me Archana – I like it, but I also blame myself to the devotees who keep on chanting my name. Sadan does not worship me like you, but he keeps chanting my name all the time, which I like, so I went to him.

On the very next day, the Brahmin went to Sadan Butcher and bowed to him, told him the whole thing and handed it over to Shrishali Gramji. Sadan Butcher got tears in hearing of the Brahmin. In his mind, he thought of giving up the work of selling and buying meat and decided that if my Thakur likes Kirtan, I will do Nam Kirtan more and more time.

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